विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 08



(" आत्यंतिक भक्तिपूर्वक श्वास के दो संधि-स्थलों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो .")


इन विधियों के बीच जरा-जरा भेद है , जरा-जरा अंतर है . और यधपि विधियों में वे जरा-जरा से हैं , तो भी तुम्हारे लिए वे भेद बहुत हो सकते हैं . एक अकेला शब्द बहुत फर्क पैदा करता है .

   इसके प्रथम रूप में भक्ति का सवाल नहीं था . वह मात्र वैज्ञानिक विधि थी . तुम प्रयोग करो वह काम करेगी . लेकिन लोग हैं जो ऐसी शुष्क वैज्ञानिक विधियों पर काम नहीं करेंगे . इसलिए जो हृदय की ओर झुके हैं , जो भक्ति के जगत के हैं , उनके लिए जरा सा भेद किया गया है : "आत्यांतिक भक्तिपूर्वक श्वास के दो संधि-स्थलों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो ."

   अगर तुम वैज्ञानिक रुझान के नहीं हो , अगर तुम्हारा मन वैज्ञानिक नहीं है , तो तुम इस विधि को प्रयोग में लाओ . यदि तुम अपने शरीर को मंदिर मान सको तो यह विधि तुम्हारे काम आ सकती है : "आत्यांतिक भक्तिपूर्वक... "
 इसका प्रयोग करो . जब तुम भोजन कर रह हो तब इसका प्रयोग करो . यह न सोचो कि तुम भोजन कर रहे हो , सोचो कि परमात्मा तुममे भोजन कर रहा है . और तब परिवर्तन को देखो . तुम वही चीज खा रहे हो , लेकिन तुरंत सब कुछ बदल जाता है . अब तुम परमात्मा को भोजन दे रहे हो . तुम स्नानकर रहे हो , कितना मामूली सा काम है . लेकिन दृष्टि बदल दो , अनुभव करो कि तुम अपने में परमात्मा को स्नान करा रहे हो . तब यह विधि आसान होगी .



विधि 100